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ये खबर हर किसी के लिए है साहब क्योंकी ....कोरबा के 'माई-बाप' गायब! मासूम लुटती रही, कुर्सी वाले देखते रहे
सवाल किसी पार्टी का नहीं, संवेदनशीलता का है

कोरबा..रजगामार में सात वर्षीय मासूम बच्ची के साथ हुई दरिंदगी और उसकी निर्मम हत्या ने हर संवेदनशील व्यक्ति को भीतर तक झकझोर दिया है। जिस उम्र में बच्चियों के हाथों में खिलौने होने चाहिए, उस उम्र में एक मासूम की जिंदगी छीन ली गई। इस घटना ने न केवल परिवार को असहनीय पीड़ा दी है, बल्कि बच्चियों की सुरक्षा, कानून-व्यवस्था और समाज की सामूहिक जिम्मेदारी पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना के बाद लोगों में आक्रोश है, आरोपी के लिए कठोर सजा की मांग हो रही है और जगह-जगह विरोध के स्वर उठ रहे हैं। लेकिन इसी बीच कोरबा की राजनीति से जुड़ा एक सवाल भी चर्चा में है—आखिर जिले के कांग्रेस और भाजपा के दिग्गज नेता इस हृदयविदारक घटना पर उतनी मुखरता से सामने क्यों नहीं दिखाई दे रहे, जितनी जनता उनसे अपेक्षा करती है?

गरीब की बेटी के दर्द की आवाज सियासत तक नहीं पहुंचती?

 

यह सवाल किसी एक राजनीतिक दल तक सीमित नहीं है। कांग्रेस हो या भाजपा, दोनों दलों के नेताओं से जनता की अपेक्षा रहती है कि जब किसी मासूम के साथ ऐसा जघन्य अपराध हो, तो वे दलगत राजनीति से ऊपर उठकर पीड़ित परिवार के साथ खड़े हों। जनता को यह भरोसा मिलना चाहिए कि बच्चियों की सुरक्षा और न्याय जैसे मुद्दों पर राजनीतिक मतभेद पीछे रहेंगे और इंसाफ की मांग सबसे आगे होगी।

 

 

रजगामार की बच्ची एक सामान्य परिवार से थी। उसके पिता मेहनत-मजदूरी कर परिवार चलाते हैं। ऐसे परिवार के लिए बेटी को खोने का दुख शब्दों में बयां करना मुश्किल है। इसी परिस्थिति में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या गरीब परिवार की पीड़ा को राजनीतिक मंचों पर उतनी ही प्राथमिकता मिलती है, जितनी किसी प्रभावशाली परिवार के मामले में मिल सकती है? यह सवाल किसी के इरादों पर फैसला सुनाने के लिए नहीं, बल्कि जनप्रतिनिधियों की संवेदनशीलता और जवाबदेही पर विचार करने के लिए है।

 

मंत्री, विधायक या बड़े अधिकारी की बेटी होती तो क्या तब भी रहती ऐसी चुप्पी?

 

रजगामार की घटना के अनुसार, बच्ची 19 अक्टूबर को किराने की दुकान से सामान लेने निकली थी, लेकिन घर नहीं लौटी। तीन दिन तक तलाश के बाद 22 अक्टूबर को उसका शव पोल्ट्री फार्म के पीछे झाड़ियों में मिला। पुलिस ने मामले में 42 वर्षीय आरोपी को गिरफ्तार किया है। पुलिस के अनुसार, बच्ची को गिरा हुआ पैसा दिलाने का झांसा देकर अपने साथ ले जाने की बात जांच में सामने आई है। इस घटना ने पूरे जिले में आक्रोश पैदा कर दिया है।

 

 

अब सवाल जिले के राजनीतिक नेतृत्व से भी है। क्या बच्चियों की सुरक्षा और ऐसे जघन्य अपराधों पर आवाज उठाना केवल ज्ञापन सौंपने या औपचारिक बयान जारी करने तक सीमित रहना चाहिए? क्या कोरबा के जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी नहीं है कि वे पीड़ित परिवार के साथ खड़े होकर न्याय की मांग को मजबूती से उठाएं और बच्चों की सुरक्षा के लिए ठोस कदमों पर सवाल करें?

 

यह भी स्पष्ट रहे कि सांसद ज्योत्सना महंत ने घटना पर दुख जताते हुए पुलिस अधीक्षक से चर्चा की और फास्ट ट्रैक कोर्ट में सुनवाई की मांग की है। इसलिए सवाल हर नेता की चुप्पी का नहीं, बल्कि जिले के प्रमुख राजनीतिक चेहरों की समग्र सक्रियता और सार्वजनिक जवाबदेही का है ।

 

सवाल किसी पार्टी का नहीं, संवेदनशीलता का है

 

कांग्रेस हो या भाजपा—जनता दोनों से जवाबदेही की उम्मीद करती है। अगर किसी मंत्री, विधायक या वरिष्ठ अधिकारी के परिवार में ऐसी त्रासदी होती, तो क्या राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर प्रतिक्रिया का स्वरूप अलग होता? यह एक सवाल है, जिसका जवाब नेताओं को अपने आचरण और सक्रियता से देना चाहिए।

 

 

गरीब परिवार की बच्ची के साथ हुई घटना भी उतनी ही गंभीर है। उसके पिता मेहनत-मजदूरी कर परिवार चलाते हैं। ऐसे परिवार को न्याय दिलाने के लिए राजनीतिक प्रभाव या आर्थिक हैसियत की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए। जरूरत है कि जांच निष्पक्ष हो, सुनवाई में अनावश्यक देरी न हो, दोष सिद्ध होने पर कानून के अनुसार कठोर सजा मिले और परिवार को नियमानुसार सहायता उपलब्ध कराई जाए।

 

जनता को बयान नहीं, ठोस पहल चाहिए

 

रजगामार की घटना केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए चेतावनी है। नेताओं को दलगत सीमाओं से ऊपर उठकर बच्चों की सुरक्षा, अपराधों की रोकथाम और पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने के सवाल पर एकजुट दिखाई देना चाहिए। जनता यह जानना चाहती है कि इस घटना के बाद जनप्रतिनिधि सुरक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए क्या पहल कर रहे हैं और पीड़ित परिवार को न्याय मिलने तक उसकी आवाज कौन उठाएगा।

 

आखिरकार, सवाल यही है—क्या गरीब की बेटी के साथ हुई ऐसी हृदयविदारक घटना भी राजनीतिक नेतृत्व को उतना ही झकझोरती है, जितना किसी प्रभावशाली परिवार की त्रासदी झकझोरती? इसका जवाब भाषणों से नहीं, बल्कि संवेदनशीलता, जिम्मेदारी और ठोस कार्रवाई से मिलना चाहिए।

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