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कोरबा बिग ब्रेकिंग,,NTPC राखड़ स्कैम : रायपुर की राख रिसदी में खपाते पकड़ी गई गाड़ी, अब बोगस टोल पर्चियों से भुगतान का खुलासा...कौन है ये सौरभ सागर....
टोल और ट्रेकिंग सिस्टम का गजब का है खेल

कोरबा ...NTPC ऐश ट्रांसपोर्ट स्कैम एनटीपीसी की फ्लाई एश परिवहन व्यवस्था में चल रहे करोड़ों रुपये के कथित खेल की परतें अब एक-एक कर खुलने लगी हैं। रायपुर के निर्माण कार्यों के लिए कागजों में आवंटित राख को बीच रास्ते में ही स्थानीय स्तर पर खपाने का मामला सामने आने के बाद अब भुगतान प्रक्रिया में भी बड़े फर्जीवाड़े की चर्चा तेज हो गई है।



हाल ही में एनटीपीसी प्लांट से एनएचएआई रायपुर के नाम पर निकली फ्लाई एश से लदी सौरभ सागर ट्रेडिंग कंपनी की गाड़ी क्रमांक CG 12 BD 9733 को रिसदी क्षेत्र में राख खाली करते हुए रंगे हाथ पकड़ा गया था। जबकि दस्तावेजों में यह खेप रायपुर पहुंचाई जानी थी।


बोगस टोल पर्चियों पर उठ रहा भुगतान!


सूत्रों के मुताबिक असली खेल राख परिवहन के भुगतान के समय होता है। बताया जा रहा है कि रायपुर के नाम पर निकाली गई कई गाड़ियां वास्तविक गंतव्य तक पहुंचती ही नहीं हैं। स्थानीय क्षेत्रों में राख खाली करने के बाद भुगतान हासिल करने के लिए रास्ते में पड़ने वाले टोल प्लाजा की कथित फर्जी और बोगस रसीदें लगाई जाती हैं।


कागजों में वाहन को रायपुर तक पहुंचा हुआ दर्शाया जाता है, जबकि हकीकत में राख को कोरबा और आसपास के क्षेत्रों में ही डंप कर दिया जाता है। यदि यह आरोप सही हैं तो परिवहन मद में लाखों नहीं बल्कि करोड़ों रुपये के भुगतान पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।


ट्रैकिंग सिस्टम पर भी उठे सवाल

एनटीपीसी से निकलने वाले प्रत्येक वाहन की निगरानी के लिए जीपीएस आधारित ट्रैकिंग व्यवस्था मौजूद है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि यदि वाहन निर्धारित मार्ग से भटककर स्थानीय क्षेत्र में पहुंच गए तो निगरानी तंत्र को इसकी जानकारी क्यों नहीं मिली? क्या ट्रैकिंग सिस्टम निष्क्रिय था या फिर जानबूझकर आंखें मूंद ली गईं?


बिना संरक्षण संभव नहीं इतना बड़ा खेल

स्थानीय लोगों और जानकारों का मानना है कि इतने बड़े स्तर पर चल रहे कथित फर्जीवाड़े को बिना विभागीय संरक्षण के अंजाम देना आसान नहीं है। चर्चा है कि एनटीपीसी के कुछ जिम्मेदार अधिकारियों की सांठगांठ से ही राख परिवहन का यह सिंडिकेट लंबे समय से सक्रिय है।


प्लांट से राख निकलने, परिवहन, डंपिंग और भुगतान तक की पूरी प्रक्रिया में कई स्तरों पर निगरानी की व्यवस्था है। इसके बावजूद यदि रायपुर के नाम पर निकली राख स्थानीय स्तर पर खपाई जा रही है तो जवाबदेही तय होना स्वाभाविक है।


सबसे बड़ा सवाल: कितनी खेपें पहले भी हो चुकी हैं गायब?

रिसदी में पकड़ी गई एक गाड़ी ने पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब जांच एजेंसियों के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या यह सिर्फ एक घटना है या फिर लंबे समय से चल रहे किसी संगठित खेल का छोटा सा हिस्सा?


यदि पिछले महीनों में रायपुर और अन्य परियोजनाओं के नाम पर भेजी गई गाड़ियों के जीपीएस रिकॉर्ड, टोल डेटा और भुगतान दस्तावेजों की निष्पक्ष जांच कराई जाए तो राख परिवहन के इस कथित करोड़ों के खेल की कई और परतें खुल सकती हैं।




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