views
जब भी देश के सबसे जांबाज और निडर सैन्य कमांडर्स की बात होती है, तो एक ऐसा नाम सामने आता है जिसकी वीरता आज भी रोंगटे खड़े कर देती है—ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान, जिन्हें इतिहास 'नौशेरा का शेर' के नाम से जानता है।
साल 1947 में जब देश का बंटवारा हुआ, तो सेना का भी विभाजन हुआ। ब्रिगेडियर उस्मान उस समय 10वीं बलूच रेजिमेंट में थे, जो बाद में पाकिस्तान के हिस्से में चली गई। मुस्लिम अधिकारी होने की वजह से उन्हें पड़ोसी मुल्क से बड़े-बड़े लालच दिए गए। उस समय उन्हें सीधे तौर पर पाकिस्तानी सेना का आर्मी चीफ बनाने तक का प्रस्ताव मिला था।
लेकिन उस जांबाज अफसर का दिल और आत्मा सिर्फ भारत के प्रति समर्पित थी। उन्होंने हर प्रलोभन को सिरे से खारिज करते हुए दो टूक कहा था—
मैं पैदा भारत में हुआ हूँ और इसी मिट्टी के लिए लडूंगा। आजादी के तुरंत बाद अक्टूबर 1947 में जब कश्मीर पर संकट आया, तो ब्रिगेडियर उस्मान को 50 पैरा ब्रिगेड की कमान सौंपकर मोर्चे पर रवाना किया गया। दिसंबर 1947 में एक रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण इलाका 'झांगर' दुश्मनों के कब्जे में चला गया। इस बात से उन्हें गहरा आघात लगा और उन्होंने एक कठोर प्रतिज्ञा ली—
"जब तक मैं झांगर को दोबारा जीतकर वहां तिरंगा नहीं फहरा देता, तब तक मैं पलंग पर नहीं सोऊंगा।"
इसके बाद कड़कड़ाती और जमा देने वाली ठंड में भी यह देशभक्त अफसर फर्श पर केवल एक चटाई बिछाकर सोता रहा। फरवरी 1948 में नौशेरा की ऐतिहासिक जंग में उन्होंने अपनी छोटी सी टुकड़ी के साथ दुश्मनों के छक्के छुड़ा दिए। इस महा-जीत के बाद उन्हें 'नौशेरा का शेर' की उपाधि मिली।
मार्च 1948 में 'ऑपरेशन विजय' के तहत उन्होंने अपना वादा निभाया और झांगर को वापस जीतकर वहां तिरंगा लहराया। इसके बाद ही उन्होंने पलंग पर विश्राम किया।
लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। 3 जुलाई 1948 की शाम, दुश्मन के एक तोप के गोले की चपेट में आने से मात्र 35 साल की उम्र में देश का यह महान सपूत वीरगति को प्राप्त हो गया। शहादत से ठीक पहले उनके आखिरी शब्द थे—
"मैं मर रहा हूँ, लेकिन जिस जमीन के लिए हम लड़ रहे हैं, उसे दुश्मन के हाथ न लगने देना।"
उनकी अंतिम विदाई में देश के शीर्ष नेतृत्व—तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद—स्वयं शामिल हुए। उन्हें मरणोपरांत देश के दूसरे सबसे बड़े सैन्य सम्मान 'महावीर चक्र' से नवाजा गया।
ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान का जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्ची राष्ट्रभक्ति किसी धर्म की मोहताज नहीं होती, यह सिर्फ मातृभूमि के प्रति अटूट वफादारी से तय होती है।
